यदि श्रीकृष्ण करुणामय हैं, तो फिर मनुष्य के जीवन में दुःख क्यों?

आज की चर्चा का विषय—करुणामय ईश्वर…भगवान करुणा के सागर…फिर भी मनुष्य के जीवन में इतना दुःख क्यों?भाइयों और बहनों…यह प्रश्न छोटा नहीं है।यह प्रश्न मनुष्य के हृदय की गहराई में छिपी हुई एक आग है।जब मनुष्य का संसार टूट जाता है…
जब प्रिय व्यक्ति खो जाता है…जब दुःख सीने के भीतर छुरी की तरह चुभता है…तब मनुष्य आकाश की ओर देखकर एक ही प्रश्न करता है—“हे भगवान…यदि आप करुणामय हैं,तो फिर मुझे ही इतना दुःख क्यों दिया?”

लेकिन आज मैं एक ऐसा सत्य कहूँगा—जिसे सुनकर,आपका हृदय काँप उठेगा।आपका विवेक जाग उठेगा।और वह सत्य यह है—करुणामय ईश्वर कभी दुःख नहीं देते…हम ही दुःख को अपने जीवन में खींचकर लाते हैं! हाँ…भगवान दुःख की रचना नहीं करते।हमारे अपने कर्म ही दुःख की रचना करते हैं।


शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है—“यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।”

अर्थात—ईश्वर को केंद्र में रखे बिना किया गया हर कर्म,मनुष्य को दुःख के बंधन में बाँध देता है।लेकिन हम क्या करते हैं?हम ईश्वर को भूल जाते हैं।धर्म को भूल जाते हैं।नीति को भूल जाते हैं।न्याय को भूल जाते हैं।

फिर भी हम प्रश्न करते हैं—“हे ईश्वर, आपने मुझे इतना कष्ट क्यों दिया?”


लेकिन सत्य कुछ और है।दुःख भगवान ने नहीं दिया।दुःख तो हमारे अपने हाथों से पकाया हुआ भोजन है!यह संसार क्या है?

शास्त्र कहते हैं—यह संसार सुख का स्थान नहीं है।गीता में स्वयं कृष्ण कहते हैं—“दुःखालयम् अशाश्वतम्।”

अर्थात—यह संसार दुःख का निवास स्थान है।


अब एक प्रश्न पूछता हूँ।क्या मनुष्य जेल में सुख करने जाता है?नहीं!जेल का नियम ही होता है—सज़ा,कष्ट,नियंत्रण,पीड़ा।राजा कब किसी व्यक्ति को जेल में भेजता है?जब वह राज्य का कानून तोड़ देता है।तो क्या राजा निर्दयी है?नहीं।अपराधी के अपराध का परिणाम ही उसे जेल तक ले जाता है।


ठीक उसी प्रकार—इस संसार का दुःख,भगवान की निर्दयता नहीं है।यह हमारे कर्मों का परिणाम है।

शास्त्रों में कहा गया है—“कृष्ण भुलि जेइ जीव अनादिर बहिर्मुख,एतएव माया तारे देय संसार दुःख।”

अर्थात—जिस क्षण आत्मा कृष्ण को भूल जाती है…उसी क्षण शुरू हो जाते हैं—दुःख,भय,रोग,मृत्यु,अशांति।

क्योंकि—कृष्ण से विमुख होना मतलब प्रकाश से दूर हो जाना।और जब प्रकाश से दूर हो जाओगे—तो अंधकार अवश्य आएगा।


कर्म का नियम बहुत कठोर है।इस संसार में कोई भी कर्मफल से बच नहीं पाया है।शास्त्र कहते हैं—“जैसा बोओगे,वैसा ही फल पाओगे।”यहाँ धन बचा नहीं सकता।परिवार बचा नहीं सकता।डॉक्टर बचा नहीं सकता।मित्र भी नहीं बचा सकता।

केवल एक ही बचा सकते हैं—भगवान।


लेकिन तभी—जब मनुष्य उनके पास लौट आता है।यह संसार वास्तव में क्या है?एक प्रशिक्षण केंद्र।एक कारागार।

यहाँ आत्मा को सिखाया जाता है—“तुम इस संसार के नहीं हो।”हम जन्म लेते हैं…मरते हैं…फिर जन्म लेते हैं…फिर दुःख पाते हैं।इस प्रकार घूमते रहते हैं,जन्म और मृत्यु के चक्र में।


गीता में कहा गया है—“आसुरी योनि में बार-बार जन्म लेना पड़ता है।”अज्ञानी मनुष्य,इस दुःख के चक्र में घूमता ही रहता है।लेकिन बुद्धिमान मनुष्य,एक दिन रुक जाता है।वह स्वयं से प्रश्न करता है—“क्या मैं इसी दुःख के चक्र में घूमता रहूँगा?”नहीं!मुक्ति का मार्ग है।इस जेल का एक द्वार है।

और उस द्वार का नाम है—भक्ति।ज्ञान नहीं।तर्क नहीं।बड़े-बड़े शब्द नहीं।

केवल—भगवान के चरणों में आत्मसमर्पण।


गीता में कृष्ण कहते हैं—“सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।”अर्थात—सब कुछ छोड़कर,केवल मेरी शरण में आ जाओ।यह “शरण”यही आत्मसमर्पण ही मुक्ति का द्वार है।

मनुष्य दुःख क्यों पाता है?

क्योंकि—हमने गलती की है।हमने ईश्वर को भुला दिया।हमने संसार को अपना घर समझ लिया।हम भोग करना चाहते थे।हमने नियमों का पालन नहीं किया।इसलिए दुःख आया।लेकिन एक सुखद समाचार है।

भगवान निर्दयी नहीं हैं।वे प्रतीक्षा कर रहे हैं।एक पिता की तरह प्रतीक्षा कर रहे हैं।

मानो वे कह रहे हों—“मेरा पुत्र कब मेरे पास वापस आएगा?”जिस दिन मनुष्य कृष्ण को अपने जीवन का केंद्र बना लेगा—उस दिन यह दुःखमय संसार,उसे बाँध नहीं पाएगा।

उस दिन टूट जाएगा—जन्म और मृत्यु का चक्र।उस दिन खुल जाएगा—मुक्ति का द्वार।क्योंकि—परम करुणामय भगवान,
आज भी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

सुनो…आज जो सत्य मैं कहने जा रहा हूँ,वह सिर्फ तुम्हें चौंकाएगा नहीं।यह तुम्हारी सोच की जड़ों को हिला सकता है।यह तुम्हारे भीतर छिपे अहंकार को तोड़ सकता है।क्योंकि आज हम एक ऐसे प्रश्न के सामने खड़े हैं—जिसे इंसान हजारों वर्षों से पूछने से डरता है,लेकिन अपने मन में जरूर सोचता है।

प्रश्न है—“अगर कृष्ण सचमुच करुणामय हैं, तो दुनिया में इतने दुष्ट लोग क्यों हैं?”

क्या कृष्ण ने बुरे लोगों को बनाया?क्या भगवान ने पाप को जन्म दिया?क्या यह संसार ही बुराई से बनाया गया है?या फिर हम ही सच्चाई को समझ नहीं पाए?

अगर तुम्हारे भीतर सच सुनने का साहस है—तो ध्यान से सुनो।क्योंकि यह सत्य तुम्हारे भीतर सोई हुई चेतना को जगा सकता है।


सबसे पहले एक बात समझ लो—यह ब्रह्मांड किसी संयोग से नहीं बना।यह एक गहरे नियम से चलता है।और उस नियम को कोई बदल नहीं सकता।यह नियम है—विपरीत शक्तियों का संतुलन।जहाँ प्रकाश है,वहाँ अंधकार भी होगा।जहाँ अच्छाई है,वहाँ बुराई भी होगी।जहाँ धर्म है,वहाँ अधर्म भी मौजूद होगा।यही सृष्टि का संतुलन है।यही ब्रह्मांड की सांस है।


एक पल के लिए आँखें बंद करके सोचो।

अगर इस दुनिया में कभी अंधकार ही न होता—और हर समय सिर्फ प्रकाश ही होता…तो क्या इंसान कभी प्रकाश को खोजता?क्या वह कभी सूर्य के लिए प्रार्थना करता?शायद नहीं।इंसान प्रकाश की कीमत इसलिए समझता है,क्योंकि उसने अंधकार का अनुभव किया है।इंसान शांति की तलाश इसलिए करता है,क्योंकि उसने अशांति को झेला है।और इंसान भगवान को इसलिए पुकारता है,
क्योंकि दुख ने उसे भीतर से तोड़ दिया है।


याद रखो—जितनी गहरी रात होती है,उतनी ही अधिक सूर्योदय की प्रतीक्षा होती है।अंधकार जितना गहरा होता है,
मनुष्य उतनी ही तीव्रता से प्रकाश खोजता है।इसीलिए इस संसार में अंधकार है।इसीलिए बुराई भी मौजूद है।क्योंकि अंधकार के बिना प्रकाश को समझना संभव नहीं।और बुराई के बिना अच्छाई को पहचानना भी कठिन है।


अब एक सच्चाई सुनो—जो पहली बार सुनने पर तुम्हें चौंका सकती है।भगवान कृष्ण ने बुराई को नहीं बनाया।हाँ, उन्होंने बुराई को नहीं बनाया।उन्होंने एक मंच बनाया है।यह पूरा ब्रह्मांड एक विशाल मंच की तरह है।जहाँ जीवन चलता है।जहाँ हर आत्मा अपना चरित्र दिखाती है।जहाँ परीक्षा भी है,पतन भी है,और उत्थान भी है।


बुराई हमेशा शत्रु नहीं होती।कई बार बुराई एक दर्पण होती है।जिसमें मनुष्य अपने भीतर के स्वभाव को देखता है।बुराई एक अग्नि की तरह भी है।

जिससे पता चलता है—कौन सोना है,और कौन सिर्फ मिट्टी।अग्नि के सामने असली और नकली का अंतर साफ हो जाता है।उसी तरह कठिन परिस्थितियाँ मनुष्य का असली चरित्र दिखाती हैं।


अगर दुनिया में बुराई बिल्कुल न होती—तो कोई भी यह साबित नहीं कर पाता कि वह सच में अच्छा है।क्योंकि परीक्षा के बिना योग्यता सिद्ध नहीं होती।संघर्ष के बिना वीरता पैदा नहीं होती।और अंधकार के बिना प्रकाश की जीत भी दिखाई नहीं देती।इसलिए यह संसार एक परीक्षा की तरह है।यहाँ हर व्यक्ति एक परीक्षार्थी है।और चुनौतियाँ ही उसके प्रश्नपत्र हैं।कुछ लोग इन प्रश्नों के सामने हार जाते हैं।कुछ लोग इन्हें पार करके और मजबूत बन जाते हैं।


भगवान कृष्ण किसी को जबरदस्ती पापी नहीं बनाते।वह किसी को जबरदस्ती दुष्ट भी नहीं बनाते।

उन्होंने मनुष्य को एक अनमोल शक्ति दी है—स्वतंत्रता।

यह स्वतंत्रता मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति भी है,और सबसे बड़ा जोखिम भी।

क्योंकि स्वतंत्रता का अर्थ है—तुम प्रकाश को भी चुन सकते हो
और अंधकार को भी।

तुम सत्य का मार्ग भी चुन सकते हो,और असत्य का भी।तुम धर्म को भी अपना सकते हो और अधर्म को भी।


जब मनुष्य अपनी स्वतंत्रता का उपयोग गलत दिशा में करता है—तभी बुराई जन्म लेती है।इसलिए बुराई के लिए भगवान जिम्मेदार नहीं हैं।यह मनुष्य के निर्णय का परिणाम है।भगवान केवल देखते हैं—क्या यह आत्मा सीख रही है?क्या यह समझ रही है?क्या यह एक दिन फिर से प्रकाश की ओर लौटेगी?


याद रखो—बुराई अंत नहीं है।यह कई बार एक सीढ़ी की तरह होती है।जिस पर पैर रखकर मनुष्य ऊपर उठ सकता है।

कभी यह अंधेरी सुरंग की तरह होती है—जिसके अंत में प्रकाश इंतजार कर रहा होता है।कभी यह एक कारागार की तरह होती है—जहाँ से निकलकर मनुष्य स्वतंत्रता का महत्व समझता है।


मानो जैसे भगवान कृष्ण हमें धीरे से कहते हैं—“मैंने बुराई को नहीं बनाया।मैंने तुम्हारे लिए अनुभव बनाए हैं।क्योंकि अनुभव के बिना समझ पैदा नहीं होती।”जिसने सच्चा प्रेम पाया है,उसने कभी न कभी दर्द भी झेला है।जिसने प्रकाश को पाया है,
वह कभी अंधकार में भटका भी है।और जिसने भगवान के सामने सिर झुकाया है,वह कभी जीवन की कठिनाइयों से टूट भी चुका है।


इसलिए बुराई से डरने की जरूरत नहीं है।उससे घृणा करने की भी जरूरत नहीं है।उसे समझना और उससे ऊपर उठना जरूरी है।याद रखो—तुम इस संसार में बुराई के दास बनने के लिए नहीं जन्मे।तुम बुराई पर विजय पाने के लिए जन्मे हो।तुम प्रकाश को चुनने के लिए जन्मे हो।तुम अपने भीतर छिपे दिव्य गुणों को जागृत करने के लिए जन्मे हो।

जिस दिन तुम दृढ़ होकर कहोगे—“मैं प्रकाश को चुनता हूँ।”उस दिन अंधकार अपने आप मिटने लगेगा।क्योंकि अंधकार की अपनी कोई शक्ति नहीं होती।अंधकार केवल प्रकाश की अनुपस्थिति है।


इसलिए प्रकाश बनो।धर्म के मार्ग पर चलो।सत्य को अपनाओ।यही कृष्ण का संदेश है।यही ब्रह्मांड का नियम है।और यही मनुष्य के जीवन का सच्चा उद्देश्य है।

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